अप्रैल का महीना और स्कूलों की लूट शुरू बेलगाम स्कूल मनमानी एडमिशन फीस और स्कूल फीस लेते हैं क्यों?


मैंने अधिकतर देखा कि हमारे देश में स्कूल किसी दुकान की तरह धड़ल्ले से चल रहे हैं। मनमानी एडमिशन फीस, मनमानी स्कूल फीस, मनमानी ड्रेस फीस ले रहे हैं और अगर आप ऐसा नहीं करते हैं अगर आप स्कूल की बात नहीं मानते हैं तो आपके बच्चों को एडमिशन नहीं मिलेगा।





आखिर सरकार चुप क्यों हैं क्यों इन स्कूलों की लगाम नहीं कस्ती। आखिर कब स्कूलों की मनमानी पर रोक लगेगी। जहां एक कॉपी की आवश्यकता पड़ती है वहां पूरे साल की कॉपी एक साथ थमा देते हैं जहां 4 महीने गर्मी पड़ती है वहां पूरे साल की गर्मी का बिल बच्चे की फीस में जोड़ देते हैं स्कूलों में कभी एग्जाम के नाम पर फीस लेते हैं, कभी प्रैक्टिकल के नाम पर, कभी किसी प्रोग्राम के नाम पर, कभी टूर और पिकनिक के नाम पर धड़ल्ले से परिवार से उगाही का काम करते हैं।





आखिर यह स्कूल है या फिर लाला की दुकान अधिकतर बच्चे स्कूल की फीस न होने की वजह से पढ़ नहीं पाते हैं अगर कैसे भी करके मां बाप अपने बच्चों का एडमिशन स्कूल में करा भी दे तो आपको ट्यूशन भी स्कूल वालों से ही पढ़ाना पड़ेगा। अगर आप अपने बच्चों को ट्यूशन नहीं पढ़ाते हो तो स्कूल आपके बच्चे को फेल कर देता है। जिससे आए दिन आत्महत्या के मामले सामने आते रहते हैं।





सरकार को इस गंभीर विषय पर सोचना चाहिए और जल्द ही इन स्कूलों की लगाम कसनी चाहिए बात बात पर हमारे देश का युवा सड़को पर हुड़दंग काटता, शोर शराबा करता, नौकरियों के लिए धरना प्रदर्शन करता हमारा युवा वर्ग अपनी सबसे ज़रूरी सबसे कीमती चीज़ यानी शिक्षा को लेकर एक दम उदासीन है। शिक्षा ही एक गरीब को इज़्ज़तदार नागरिक बना सकती है। फिर हमारे देश की जनता सरकारों से स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन से सुधार की कोई मांग क्यो नहीं करता।





1.कोरोना काल मे भी फीस बराबर ली गई।





2.बच्चो को एक निश्चित दुकान से ही ड्रेस लेनी है जिसकी क्वालिटी इतनी घटिया की घर मे पहनने वाले कपड़े उससे कही बेहतर होते है। गर्मी में बेहतरीन फेब्रिक की कीमत में सबसे घटिया कपड़े बच्चो को पहनाने को मजबूर मां बाप।जूते ऐसे की दो महीने मुश्किल से ही चलते हैं।





3.एक निश्चित दुकान से ही कॉपी और किताबें लेनी है। बुक्स का भी पूरा पैकेट लेना पड़ेगा। अगर आपके घर मे रबर पेंसिल बुक कवर या कोई किताब पहले से मौजूद है तो भी आपको लेना पूरा पैकेट ही है। स्कूलों ने अपने-अपने कॉपी और किताबों के गोदाम खोल रखे हैं बाहरी बुक सेलर बंद स्कूलों की दुकानें शुरू (कब तक फ़िज़ूल के मुद्दों पर हमारा युवा वर्ग अपनी क्षमताओं को खर्च करेगा? कब हम अपना हक मांगना अपने फ़र्ज़ अदा करना सीखेंगे ?) धन्यवाद





पत्रकार वसीम अहमद


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